हमारे देश भारत में आध्यात्म एवं दर्शन का बहुत ही पुराना इतिहास रहा है और यह एक इतिहास ही नही है बल्कि न जाने कितने गौरवशाली उदहारण एवं विचार भी हमे ही नही बल्कि संपूर्ण विश्व समाज को प्राप्त हुआ है। साथ ही बढ़ता रहा है भारतीय सभ्यता और धर्म 'हिंदुत्व'।
भारत की यह विशेषता है की यह अपने संस्कृति एवं समाज में विभिन्न जाति-धर्म को सहेजे हुए सदैव नित नयी विकासशील गति से बढ़ रहा है। परन्तु भारत में बहुसंख्यक हिंदू समाज में विभिन्न धार्मिक संगठन का उद्भव इस बात की ऑर इंगित करता है की धार्मिकता की ये लहर पूर्ण हिंदू समाज में हिंदू धर्म के प्रति जागरूकता लाने की एक पहल है। परन्तु यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा की यह प्रयास वर्तमान तक जागरूकता लाने के प्रति एक उत्कृष्ट प्रयास न होकर मात्र राजनीती का खेल बन कर रह गयी है जो संपूर्ण हिंदू समाज के लिए उनके भावनाओ के ऊपर एक कठोर प्रहार मात्र है।
विगत दिनों के समाचारों को अगर देखा जाए और उसकी स्वस्थ मन एवं सकारात्मक विचार से समिक्च्छा की जे तो इन हिंदू धार्मिक संगठनो का प्रयास हिंदू धर्म के जागरूकता के प्रति कितना रहा है यह स्पष्ट हो जाता है। विगत समाचारों एवं घटित घटनाओ से यह कटु अनुभव हुआ की इन संगठनो के द्वारा पार्क में मिलने वाले लड़के लड़कियों को परेशान करने, अन्य धर्म के लोगो के धार्मिक स्थल के विवादों का राजनितिक फायदा उठाने, अन्य धर्म के अनुयायियों को शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक रूप से आहात करने के सेवा हिंदू धर्म के जागरूकता का लिए कुछ भी नही किया गया। अगर देखा जाए तो, ये धार्मिक संगठन अपने कुछ सदस्यों का साथ भले ही मिलकर असामाजिक कार्यों में लिप्त रहे लेकिन भारत की अधिकांश जनता इनका साथ नही देती, विशेषकर भारत की युवा पीढी। इन संगठनो का कुछ कथित नेता स्वयम का राजनितिक लाभ हेतु कुछ युवाओं को बरगला कर अपने संगठन में भावनात्मक रूप से जोड़कर समाज का प्रति नकारात्मक विचार भरती है और रुर्हिवादिता का आधार पर देश का प्रगति एवं विकास का मार्ग में रोरा अटकाती हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो इन संगठन का नेताओं का स्वयम का परिवार ही इनके विचारो एवं आह्वाहन का विपरीत आधुनिकता में लिप्त होता है। लेकिन इन संगठनो से जुरे हुए कार्यकर्ता रूपी युवा इन सुख्चामता को परख नही पा रहे।
मुझे एकबार ये देखकर अस्चर्या हुआ की एक ऐसे ही संगठन का नेता से जब हिंदू धर्म का वेदों में से किसी एक वेड की ऋचा को सुनाने का लिए कहा तो वे taalmatol करने लगे। तो जरा sochiye की क्या ये धार्मिक संगठन समाज को हिंदू धर्म के प्रति जग्रून कर भी पाएंगे क्या ? इस घटना के समय एक बात बडे दुःख के साथ याद परी जब स्वामी विविकानंद जी ने हिंदू धर्म के जागरूकता एवं विस्तार के लिए भारतीय युवा वर्ग से आह्वान किया परन्तु उनके आह्वान का अपेक्षाकृत परिणाम ना प्राप्त हो सका। वो आह्वान किसी अन्य धर्म को पीड़ित एवं शोषित करने का नही था बल्कि वो आह्वान था विश्वस्तर पर हिंदू धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए। काश वर्तमान में कुकुरमुत्ते के तरह फैले हुए इन कथित हिंदू धार्मिक संगठनो के द्वारा ही स्वामी विवेकानंद के सपने को पूर्ण किए जाने का प्रयास किया जाता तो आज विश्वस्तर पर हिंदू धर्म के प्रति जागरूकता एवं रूझान ही कुछ और होता।
आज हिंदू धार्मिक संगठनो के नेताओं को यह चाहिए की वेदों के प्रति लोगो का रूझान लाने का प्रयास करें। लोगो को वेदों से परिचित कराएँ।
मुझे तो नही लगता की किसी धार्मिक संगठन ने अपने हिंदू धर्म के गरीबी रेखा से नीचे रह कर जीवन व्यतिरटी करने वाले किसी परिवार के कल्याण के लिए कोई विशेष अभियान छेरा हो। जानकारी प्राप्त हुयी की पवन स्थल काशी, वाराणसी एवं हरिद्वार में बच्चों को वेदों की सिक्छा देने का कार्यकर्म को मूर्तरूप देते हुए वेदों का पाठ कराया जाता है। इसकी चर्चा एक कतिपय हिंदू धार्मिक संगठन के नेता से वार्ता के दौरान मैंने किया साथ ही इस पर भी चर्चा करने का प्रयास किया की अन्य स्थानों पर ऐसा ही प्रयास क्यों नही किया जा रहा ? उनका जवाब आश्चर्य कर देने वाला था। उन्होंने बड़े सहज भाव से प्रतिउत्तर दिया की लोग अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ना चाहते हैं कोई ये नही चाहता की उनका बच्चा संस्कृत की सिक्छा ग्रहण करे। मैं तुंरत समझ गया की इनका प्रयास कितना है और कितना तथ्य आंकडो पूर्ण है। उनका जवाब निश्चित रूप से युक्ति संगतता एवं तथ्यपरकता से काफ़ी दूर था और संभवतः इसका कारन इस गूढ़ एवं गंभीर विषय पर अध्ययन एवं विश्लेषण के प्रति उनके प्रयास न किए जाने को दर्शाता था। उनके प्रतिउत्तर के अनुक्रम में मेरा अगला प्रश्न उन्हें मूक-बधिर करने के लिए काफ़ी था और मेरा अगला प्रश्न था -- "क्या हिंदू समाज का हरेक बच्चा इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में ही पढता है ?" मैं तो यह कहता हूँ इन धार्मिक संगठनो ने कभी प्रयास ही नही किया की हिंदू धर्म की महत्ता एवं वेदा के बारे में हिंदू समाज को जागरूक एवं शिक्छित किया जाए। कौन कहता है की हिंदू समाज मात्र धनाढ्य परिवारों का समाज है, क्यों नही गरीबी रेखा से निचे जीवन व्यतीत करने वाले परिवार को अभिप्रेरित करते हो की वो अपने बच्चो को वेदों का ज्ञान दिलाने में तुम्हारा सहयोग करे, मैं जनता हूँ की ऐसे लोगो के बच्चे कम उम्र से ही खेतो में मजदूरी करते हैं, चाय के दुकानों में मजदूरी करते हैं और अपने परिवार के लिए आय अर्जित करने का साधन बन जाते हैं और उनके अभिभावक इन्ही कारणों से इन बच्चो के शिक्षण पर ध्यान नही देते। परन्तु ये धार्मिक संगठन जो शहरों के विभिन्न पार्को का दौरा कर लेते हैं, किसी अन्य धर्म के विरोध में कई अभियान छेड़ देते हैं, चुनावों के समय लाखों-करोड़ों रूपया पानी की तरह बहा देते हैं। क्या इन सब में लगनेवाला व्यय एक गरीब को वेड की शिक्छा देने के बदले उनके परिवार को कुछ आर्थिक मदद करने से अधिक होगा ? कदापि नही। मुझे विस्मृत हो रहा है श्री लालू प्रसाद यादव जी का एक बहुमूल्य एवं सराहनीय प्रयास। जब वो बिहार के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने चरवाहा विद्यालयों की गठन किया और इन विद्यालयों में ऐसे लड़को को शिक्छा देने का कार्य प्रारम्भ किया जो गावों में चरवाहे का काम कर जीवन यापन करते थे और अपना तथा अपने परिवार का जीवन यापन करते थे। इन विद्यालयों में ये चरवाहे अपने जानवरों के साथ आते और उनको विद्यालय परिसर में ही चरणे के लिए छोड़ कर स्वयम पढ़ाई करते थे। विद्यालय से उनको मुफ्त का खाना मिलता और शिक्षा भी। साथ ही परिसर में परिपूर्ण चारागाह होने से उनको अपने जानवरों के देखभाल का काम भी हो जाता था और उनके आय का साधन भी यथावत बना रहता था। ठीक इसकी प्रकार का प्रयास इन संगठनों के द्वारा क्यों नही किया जा रहा ? ग्रामीण छेत्रों में वेदों के ज्ञान हेतु वेदा-विद्यालयों का निर्माण कराया जाए और उनमे पढ़ने वाले गरीब बच्चों को खाने के साथ साथ वस्त्र एवं कुछ मासिक धन भी पारितोषिक के रूप में दिया जाए। जिससे की उनकी परही भी हो सके और उनके परिवार का भरण पोषण भी। और मुझे नही लगता की इस कार्य हेतु लगने वाला कुल लागत, चुनावों के प्रचार में लगने वाले लागत से अधिक होगा। इसप्रकार जो छात्र ऐसे विद्यालयों से निकलेंगे वो वेदों का प्रचार-प्रसार भी करेंगे और अपने ज्ञान के मध्यम से आजीविका का साधन भी प्राप्त कर सकेंगे। और इन सबसे महत्वपूर्ण तो ये हो सकेगा की वेदों का ज्ञान जो लुप्तप्राय होने की स्थिति को प्राप्त कर रहा है वह फ़िर से जागृत हो सकेगा।
मेरे इस प्रयास को आप सभी जन-जन में फैलाएं जिस से की लोग इन संगठनो से उपरोक्त हेतु अनुरोध कर सकें की ये संगठन भारत के युवाओं को धर्म के नाम पर भटकायें नही बल्कि उन्हें हिंदू धर्म के प्रति जागरूक एवं शिक्छित करें। जिस से की मात्र भारतवर्ष में ही नही बल्कि पुरे विश्व में हिंदू धर्म के प्रति लोगो को जागरूक किया जा सके। परन्तु इस महान कार्य हेतु आवश्यक होगा इसे अभियान का रूप दिया जाए और पूर्ण योजना के साथ एवं पूर्ण प्रतिबधता के साथ इस पवित्र उद्देश्य के पूर्ति हेतु भारत के जन जन से आह्वान किया जाए।
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
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